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यहूदियों (इस्रायल) का जज्बा

80 लाख यहूदी (इस्राएल) अपने आसपास के सभी देशों पर भारी पड़ते है, लेकिन 100 करोड हिंदूओं (भारत) में ऐसा जज्बा नहीं है, ऐसा क्यों?

क्योंकी यहूदी संगठित है. उनके मजहब में ही संगठन की व्यवस्था है. उनके मंदिर (सिनेगॉग) में वे सभी एक विशिष्ट समय पर प्रार्थना करते है, जिससे उनका एकत्रीकरण होता है. यही एकत्रीकरण उनका संगठन है.  प्रार्थना के बहाने उनका एकत्रीकरण होता है, इसके साथ ही अन्य मजहब के बारे में उनकी एक विशिष्ट विचारधारा भी है, जो उन्हें सजग करती है और संगठित रखती है. इसी कारण उनमे वह जज्बा उत्पन्न होता है.

वे एकेश्वरवादी/एकमतवादी है. वे अपने सिनेगोग में दिन में तीन बार तथा योम-कीपर त्यौहार के समय दिन में पांच बार एकत्रित आकर प्रार्थना करते है.

हिंदू भी एक परमात्मा पर विश्वास रखते है. किन्तु उनका प्रार्थना करने का कोई एक समय निश्चित नहीं, वे ईश्वर की उपासना करने के लिए एकत्रित नहीं आते. अर्थात वे विशिष्ट समय पर प्रार्थना नहीं करते. इससे उनका एकत्रीकरण नहीं होता, तथा  उनके पास संगठन की विचारधारा नहीं है,  इसीलिए वे संगठित नहीं है. वे ईश्वर की उपासना को भूल गए है.

वह ईश्वर की उपासना है- ध्यान-उपासना. यह उपासना केवल १० मिनिट की है. इस उपासना में फल, फुल, पैसा, समय खर्च नहीं होता, इसमें पंडित या पुजारी की आवश्यकता भी नहीं है.यह उपासना किसी भी मंदिर या हॉल में आयोजित की जा सकती है. तथा इसके लिए ध्यानालय भी निर्माण किये जा सकते है. किसीभी स्थानिक व्यक्ति को इस उपासना का नेतृत्व दिया जा सकता है. रोज अलग-अलग व्यक्ति को भी यह दायित्व दिया जा सकता है.

यहूदी-मजहब में सिनेगौग में प्रार्थना का आयोजन करने के लिए व्यक्ति की नियुक्ति की जाती है. और उसे वेतन भी देते है. हिन्दुओं में बड़े बड़े मंदिर में पुजारियों को वेतन दिया जाता है. उसीतरह मंदिर/ध्यानालय में ध्यान-उपासना का आयोजन करनेवाले व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए और उसे वेतन भी देना चाहिए. सभी मजहब में यही तरीका है, फुकट में काम करनेवालों की संख्या बहुत कम है.

अगर रोज शाम को या हप्ते में एक बार भी इस उपासना के लिए हिंदू एकत्रित आयेंगे, तो उनकी एक अद्भुत संगठित-शक्ति खड़ी होगी. रोज दिन में दो बार (सुबह-शाम) वे उपासना के लिए एकत्रित आयेंगे, तो उनका एक विशाल संगठन बनेगा.

वेदों में भी दिन में तिन बार उपासना करने के लिए कहा गया है. (Details in E-book – हिंदू एकता का तंत्र )

लोग कभी भी उपासना के लिए स्वयं एकत्रित नहीं आते. उनसे सतत संपर्क करना पड़ता है और उनको बुलाना पड़ता है. हिंदू भी उपासना के लिए स्वयं एकत्रित नहीं आयेंगे, उनको भी बुलाना पड़ेगा, उनसे संपर्क करना पड़ेगा, इसमें प्रयास और संयम की आवश्यकता है. इस उपासना का प्रचलन बढ़ाने की आवश्यकता है. जब इसका प्रचलन बढ़ेगा तो निश्चित ही हिंदू भी एकत्रित आयेंगे. और संगठित बनेंगे.

सभी हिंदूओं से निवेदन है की वे इस पर सकारात्मक विचार करें और कार्य करें.

यहूदी प्राचीन मजहब है, हमें उनके मजहब की परम्परा तथा रीतिरिवाज लेने की या उनकी देखा-देखी करने की आवश्यकता नहीं. सिर्फ उनका जो जज्बा है वह जानने की आवश्यकता है. फिर भी उनके मजहब के बारे में जानकारी अवश्य रखे. क्योकि यहूदीओं का भारत देश के साथ बहोत पुराना सम्बन्ध है. वे पहली बार हमारे देश में अंग्रेजी वर्ष के 2100 वर्ष पहले अर्थात आज से करीब 4 हजार वर्ष पहले से ही केरल और गुजरात, मुंबई के पास पेन में आये. यहाँ स्थायिक हुए. (Read more in Wikipedia) उन्होंने हिन्दुधर्म पर कभी हमला नहीं किया, ना ही हिन्दुधर्म की प्रताडना की. उनका हिंदुओं के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार रहा है. इसलिए स्वामी विवेकानंद ने कहा था की हिंदू और यहूदी स्वाभाविक मित्र है. इसके बाद ही एक यहूदी श्री ह्यूम ने ही कांग्रेस की स्थापना करके हिंदुओं को राजनीतीक दृष्टिकोण दिया और सक्रीय किया.

उनके रीतीरिवाज और परंपरा निम्न प्रकार से है-

  1. वे खतना करते है:- इस्राएल में पानी के कमी के कारण गुप्तांगो को एक विशिष्ट बीमारी होती थी, उसे बचने के लिए वे खतना करते है और यही उनका मजहबी रिवाज है.
  2. वे सुअर से नफ़रत करते है तथा उसके मांस को वर्ज मानते है:- इस्त्रायल में पानी के कमी के कारण पानी का संरक्षण करना आवश्यक माना गया है. सुअर पानी को गंधा करते है, उसमे कीचड़ करते है. शायद इसी बजह से वे सूअर से नफ़रत करते होंगे.
  3. वे मूर्तिपूजा नहीं करते:- इसका कारण यह है की यहूदियों के १२ कबीले थे, वे सभी मूर्तिपूजक थे, उनके रितिरिवाज अलग-अलग थे. उनको लगा की इस अलग-अलग रीतिरिवाज के कारण ही यहूदियों में एकता नहीं है, वे संगठित नहीं है, उनमे लढने की क्षमता/जूनून  नहीं है. इसलिए उन्होंने एकेश्वरवाद की स्थापना की और सबका रीतिरिवाज एक किया.केवल एकेश्वरवाद से संगठन नहीं होता,  इसलिए मोजेस ने सिनेगोग बनाया.
  4. सिनेगाग – रोज तिन बार प्रार्थना के लिए लोगों को एकत्रित किया. लोगों को सिनेगोग में बुलाने के लिए भोपू बजाना शुरू किया, भोपू बजते ही सभी यहूदी सिनेगोग में एकत्रित आते है. वे दिन में तिन बार और त्यौहार के समय पांच बार प्रार्थना करते है, अर्थात एकत्रित आते है, यह एकत्रीकरण ही उनका संगठन है. इसके बावजूद वे सिनेगाग द्वारा स्कूल, अस्पताल, अन्य समाज सेवा का कार्य करते है, तथा गरीबों को हर संभव मदत देते है.
  5. प्रोफेट/पैगम्बर- यहूदी प्रोफेट/पैगम्बर को मानते है:- उनका प्रोफेट है मोजेस है. मोजेस को वे मुख्य तथा आखरी पैगम्बर मानते है. और मोजेस का अनुकरण करते है, उनके बताये मार्ग पर चलते है. लोग मोजेस का कहना माने इसलिए मोजेस खुद को उनके देवता यहोवा का संदेशवाहक/पैगम्बर बताया. उनके देवता का दूत उनसे मिलता है और सन्देश देता है ऐसा घोषित किया. मोजेस ने अपनेआप  को पहले के सभी दार्शनिकों जिनका प्रभाव लोगों पर था उनके साथ जोड़ा जैसे अब्राहम, जुडाह, नोह, इसाक इत्यादि. इन दार्शनिकों को पैगम्बर घोषित किया. पैगम्बरवाद का निर्माण ही मोजेस ने किया.(Reference – Hindu view of Christianity and Islam by Ram Swarup. Search this book in Google).
  6. एकेश्वरवाद- एकेश्वरवाद एक जूनून है जिसकी खोज मोजेस ने की. मोजेस के पहले भी कुछ इजिप्त के छोटे समूह एकेश्वरवाद को मानते थे. उनको देखकर ही मोजेस ने एक विशिष्ट व्यवस्था स्थापन की और यहूदी मजहब की स्थापना की. उनके  देवता का नाम “यहोवा” है. उस समय कई देवता को माना जाता था, उसमे से उन्होंने यहोवा को चुना. और इस देवता को ही एकमात्र घोषित किया. एकेश्वर घोषित किया.  मूलतः एकेश्वरवाद का उद्देश आध्यात्मिकता नहीं है तो समाज का संगठन है, जूनून है. इससे जो संगठनशक्ति बनती है उसका उद्देश देश से सभी गैरों को हकालना/मारना है. यह एक विचारधारा है, श्रद्धा के आधारपर बनाया संगठन है. इसके आधारपर मोजेस ने इस्राएल की स्थापना की और इस्राएल से सभी गैर-यहूदियों को (रोमन और अरबों) को भगा दिया. आगे चलकर इसी रोमन और अरबो ने यहूदी किताब तौराह पर आधारित अपना-अपना अलग अलग एकेश्वरवाद/साम्राज्यवाद बनाया. और अपने-अपने देश निर्माण किये और गैरों को वहाँ से भगाया/मार दिया. ये नए एकेश्वरवादी विस्तारवादी है. यहूदी केवल एक देश इस्राएल तक सिमित थे, किन्तु ये विस्तारवादी बने. यहूदियों ने इन एकेश्वरवादियों को आजतक मान्यता नहीं दी इसलिए वे यहूदियों से नफ़रत करते है, इसी नफ़रत से नाझीवाद का जन्म हुआ. किन्तु ये नए एकेश्वरवादी परोक्ष रूप से यहूदियों का ही अनुकरण करते है और यहूदी किताब तौराह का ही आदर्श फैला रहे है.
  7. तौराह :- यह उनकी मजहबी किताब है. उनकी यह मान्यता है की यह किताब उनके देवता यहोवा ने मोजेस को दी है. इसका प्रत्येक शब्द उनके देवता यहोवा का है. इसके पहले किसी को भी यहोवा ने किताब नहीं दी, सिर्फ मोजेस को ही दी, इस तरह प्रचार किया गया. इस किताब ने सभी यहूदियों, रोमन, अरबियों की धारणा ही बदल दी. अरबी और रोमन लोगों पर भी इसका प्रभाव पड़ा, उनकी भी धारणाये बदलने में यह किताब कामयाब रही. वे भी इसे देवता की किताब मानने लगे.
  8. हलाका(halakah)- यह यहूदियों का एक मजहबी-कानून है.  इस कानून के अनुसार समाज पर कई बंधन डाले गए थे.
  9. वे उपवास भी करते है. योम कीपर के समय वे उपवास रखते है, वे फरिश्तों को मानते है, वे अपने देवता को खुश करने के लिए जानवरों की बलि भी देते है इत्यादि.  अधिक जानकारी के लिए पढ़े http://www.jewfaq.org

यह उनके रीतिरिवाज और मान्यता है, हमें उनके रीतिरिवाज और मान्यता को मानने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकी हमारे पास अपने रितिरिवाज और परंपरा है. इसे मूर्तिपूजा के नाम पर नष्ट करना योग्य नहीं है. यह यहूदीकरण है. कुछ मजहबों ने यहूदियों की देखा-देखी की और अपनेदेश की प्राचीन परम्पराओं को मूर्तिपूजा के नाम पर नष्ट किया, इस तरह न चाहते हुए भी वे यहूदीकरण का शिकार हुए और यहूदी मजहब तथा देवता यहोवा का कार्य कर रहे है. अधिक जानकारी के लिए पढ़े  http://www.simpletoremember.com/articles/a/islamjudaism/ तथा http://www.torahjudaism.org/index.php/articles उन्होंने यहूदी की किताब तौराह सचमुच ईश्वर की किताब समझ कर उस पर आधारित  एकेश्वरवाद बनाया. आज जितने भी एकेश्वरवादी है वे सभी आपस में झगड़ रहे है. 

हिंदुओं के पास वेदों पर आधारित एकेश्वरवाद है. यह एकेश्वरवाद “एक सद विप्रा बहुधा वदन्ति” पर आधारित है. इसका अर्थ है ईश्वर एक है किन्तु ईश्वर को अनेक रूप तथा नाम से मानने का, पूजने का, उपासना करने का स्वातंत्र है. इससे ईश्वर के नाम से झगड़े नहीं होते, लोग आपस में सह-अस्तित्व की भावना रखते है, इससे समाज में शांति बनी रहती है. इसमें अपने और गैर ऐसे मानवता के टुकड़े नहीं है. यह एकेश्वरवाद मानवतावादी और सहिष्णु है, सह-अस्तित्व को प्रचलित करता है. तौराह पर आधारित एकेश्वरवाद मानवता के दो टुकड़े करता है एक- अपने और गैर, फिर वह गैरों के खिलाफ लढाई करता है, उन्हें नष्ट करता है. इससे अशांति फैलती है. यहूदी-एकेश्वरवाद से प्रभावित मजहब हिंदुओं के धर्म को मूर्तिपूजा के नाम से नष्ट करना चाहते है. और इसी कारण भारत में अशांति का माहौल है.

हिंदुओं के सामने चुनौती है अपनी परंपराये बचाने की और संगठित होने की. हिंदू/भारतीय अपनी संस्कृति, परंपरा, रीतिरिवाज को कायम रखकर उसके अनुसार ईश्वर-भक्ति और उपासना के लिए एकत्रित आये. साकार उपासना (मूर्तिपूजा) तथा निराकार उपासना (ध्यान-उपासना) में समन्वय प्रस्थापित करें. ध्यानालयों का निर्माण करे और दिन में सुबह शाम ध्यान-उपासना के लिए एकत्रित आये. यह एकत्रीकरण हिंदुओं को संगठित करेगा.

यहूदी प्रभावित एकेश्वरवाद गैरों के खिलाफ एक जूनून है,  एक राजनैतिक, साम्राज्यवादी षडयंत्र है. हमें ऐसा जूनून या राजनैतिक षडयंत्र नहीं चाहिए, बल्कि सत्य-धर्मनिष्ठा और शांतिपूर्ण जीवन चाहिए.  जो भी राजनैतिक षड्यंत्र अपने देश के खिलाफ हो रहे है उसे देश के नेताओं ने कूटनीतिक तरीके से परास्त करना चाहिए अथवा समय-समय पर उचित सैन्य शक्ति का भी उपयोग करना चाहिए. इसके लिए हम सभी हिंदुओं ने अपनी संगठितशक्ति खड़ी करनी होगी,  तभी हिंदुओं में भी यहुदिओं जैसा जज्बा नजर आयेगा.

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