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हिंदू-एकेश्वरवाद 

हिन्दुधर्म में दो प्रकार की उपासना पद्धतियाँ प्रचलित है- एक निराकार और दूसरी साकार।

निराकार उपासना में ईश्वर एक है, वह ॐ है। ॐ यह अव्यय है, सम्पूर्ण निराकार है, एकेश्वर है। इस ईश्वर की एकमात्र उपासना है ध्यान। यह हिंदू-एकेश्वरवाद है। यह हजारों साल पहले वेदों ने बताया है।

साकार उपासना में ईश्वर के अनेक अवतार और रूप है। जितने भी साकार स्वरुप है, वे सभी निराकार के ही साकार-रूप है, मात्र वह एक ही है। वह विष्णु है, वह ब्रह्मा है, वह शिव है, वह राम है, वह कृष्ण है। वे दिखने में विविध है, अनेक है, किन्तु वे सब एकही है।

भगवदगीता ने कहा है- निराकार ब्रह्म ॐ ही साकार श्रीकृष्ण है (अध्याय ९:१७)। ईश्वर ने अपने सारे रूप अर्जुन को दिव्यदृष्टि देके दिखाये है। ईश्वर का ना आदि है, ना मध्य है, ना अंत है। वह विश्वरूप है। वह सर्वत्र है, वह एकमात्र है। वह निराकार है, और साकार भी बनता है। ईश्वर के लिए सबकुछ संभव है।

हिन्दुधर्म में साकार और निराकार में समन्वय है। इससे समाज सर्वसमावेशक तथा अहिंसक बनता है। हिन्दुधर्म में साकार का विरोध नहीं है, बल्कि साकार को मान्यता है।

हिंदू-एकेश्वरवाद में किसी भी प्रार्थना, उपासना, पूजापाठ, कर्मकांड से पहले ॐ का उच्चारण करना आवश्यक है, ताकि ईश्वर एक है इसकी भावना बनी रहे तथा एक ईश्वर से कृतज्ञता बनी रहे।

हिंदू-एकेश्वरवाद में ईश्वर पूर्णतः निराकार है। इस ईश्वर का कोई घर नहीं, कोई दिशा नहीं, कोई पत्थर नहीं, कोई मूर्ति नहीं, कोई प्रदक्षिणा नहीं, कोई त्यौहार नहीं, कोई गाना बजाना नाचना नहीं, कोई कर्मकांड नहीं, कोई क़ुरबानी/बलि नहीं। अगर है तो वह साकार उपासना है। साकार उपासना में ही ईश्वर का घर, दिशा, पत्थर, मूर्ति, प्रदक्षिणा, त्यौहार, नाचना, गाना, कर्मकांड, क़ुरबानी/बलि इत्यादि होती है। निराकार उपासना में ऐसा कुछ नहीं होता। निराकार उपासना में ईश्वर का शुद्ध और शांत मन से ध्यान किया जाता है। केवल ध्यान करना ही निराकार उपासना है।

हिंदू-एकेश्वरवाद में ईश्वर और मनुष्य के बिच कोई मध्यस्थ, कोई प्रतिनिधी, कोई संदेशवाहक नहीं है। क्योंकि ये मध्यस्थ हमेशा लोगों को ईश्वर के नाम से गुमराह करते है, लोगों को भटकाते है। इससे लोगों की आध्यात्मिक अधोगति होती है। मध्यस्थ, प्रतिनिधि या संदेशवाहक होना यह निराकार ईश्वर के लक्षण नहीं है। बल्कि राजा, महाराजा, बादशाह, शहंशाहों जैसे देवताओं का लक्षण है।

हिंदू-एकेश्वर की मान्यता है-
य एक इत्तमुष्टुहि| (ॠग्वेद 6:45:16) अर्थात ईश्वर एक हैं|
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निअमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान| एकं सदिप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु|| (ॠग्वेद 1:164:46) अर्थात ईश्वर को ही इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम और मातरिश्वा कहते हैं| वही दिव्य सुन्दर और गरुत्मान हैं| उस एक सत्य को ही विद्वानजन अनेक नामो से पुकारते हैं|

ईश्वर का कोई भी नाम हो ईश्वर एक ही है, वह ॐ है। यह हिंदू-एकेश्वरवाद वेदों पर आधारित है।

दुनिया में दो प्रकार के एकेश्वरवाद है- एक वेदों पर आधारित और दूसरा तौराह -Old Testament (ज्यु ग्रन्थ) पर आधारित।

वेदों पर आधारित एकेश्वरवाद कहता है- ईश्वर एक है, इस एकेश्वर को अनेक नामों के पुकारने की अनुमति है। इसलिए ईश्वर के किसी भी नाम का इस एकेश्वरवाद में विरोध नहीं है। मात्र सभी प्रार्थना/उपासना के समय ॐ का उच्चारण आवश्यक है ताकि ईश्वर एक है इसकी भावना बनी रहे तथा एक ईश्वर से कृतज्ञता बनी रहे।

तौराह पर आधारित एकेश्वरवाद कहता है- ईश्वर एक है, अन्य कोई ईश्वर नहीं है। वे इस एक ईश्वर को अपनी भाषा में एक नाम देते है और अन्य सभी नामों को नकारते है तथा अन्य नाम और उपासना स्थल को नष्ट करते है। अन्य नामों को और उनके स्थलों को नष्ट करने का आदेश तौराह में दिया है (ref.- Deuteronomy 12:2-3 ) ।

तौराह पर आधारित सारे मजहब भटक गए है। उन्होंने उनके देवता के घर बनाये है। क्या निराकार के घर होते है? वे निराकार नहीं, साकार ही है। वे जो प्रार्थनाये करते है, वे भी साकार की ही है, निराकार की नहीं। निराकार की एक ही उपासना है वह है ध्यान।
उन्होंने उनके देवता के नाम पर कानून बनाये है। ये कानून राजनीती से प्रेरित है। इस तरह कानून बनाना ईश्वर का काम नहीं, राजाओं का है। जो प्रत्येक देश की स्थिति पर आधारित भिन्न भिन्न हो सकते है। हिंदू-एकेश्वरवाद में कोई कानून नहीं, इसमें कोई राजनीती नहीं है। हिंदू-एकेश्वरवाद का एकमात्र उद्देश आध्यात्मिकता और शांति है।
दुनिया में जितने ही मजहब/पंथ है वे सभी उनके साकार देवता की ही उपासना करते है, वे किसी ना किसी घर/मंदिर/मूर्ति/पुतला/पत्थर की उपासना करते है, उसकी तरह देखकर ही प्रार्थना करते है, प्रदक्षिणा करते है, त्यौहार मानते है, उपवास करते है, यह साकार उपासना ही है। निराकार उपासना तो शांत और शुद्ध मन से ॐ का उच्चारण करते हुए ध्यान करना ही है. यह ही एकमात्र एकेश्वर है।

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