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ध्यानालय और मंदिर की विशेषताए.

ध्यानालय यह निराकार उपासना की व्यवस्था है, मंदिर यह साकार उपासना की व्यवस्था है.
ध्यानालय में ईश्वर की मूर्ति/प्रतिमा नहीं होती, मंदिर में ईश्वर की मूर्ति होती है.
ध्यानालय में ईश्वर का ध्यान किया जाता है. मंदिर में ईश्वर की आरती, पूजापाठ होती है.
ध्यानालय, एक हॉल होता है. मंदिर, देवस्थान होता है.
ध्यानालय में ध्यान-उपासना का समय निश्चित होता है जैसे सुबह, दोपहर, संध्याकाल. मात्र मंदिर दिन भर खुले रखे जा सकते है.
ध्यानालय और मंदिर का एकदूसरे को विरोध नहीं है. ध्यानालय के पास मंदिर हो सकता है और मंदिर के पास ध्यानालय हो सकता है. इसतरह निराकार और साकार उपासना में विरोध नहीं है, बल्कि समन्वय है. यह दोनों उपासना पद्धतियां ईश्वर प्रदत्त है, नैसर्गिक है.
प्राचीनकाल से साधू/सन्यासी ध्यान-उपासना करने के लिए हिमालय तथा अन्य पर्वतों पर जाते थे, कुछ लोग वन/जंगलों में जाते थे. किन्तु सर्वसामान्य लोगों के लिए ध्यान-मंडपम/ध्यानालय की व्यवस्था होती थी.
ध्यानालय तथा ध्यान-उपासना में सामायिकता है, इसलिए इससे समाज एकरूप/संगठित बनता है, मात्र मंदिर समाज का सांस्कृतिक केंद्र है, यहा विविधता होती है.
आज भारत में सभी जगह मंदिर की व्यवस्था है, मात्र ध्यानालय की व्यवस्था नहीं है. हिन्दुओं में साकार उपासना के साथ निराकार उपासना की व्यवस्था भी उपलब्ध होनी चाहिए, बल्कि निराकार उपासना को प्राथमिकता देनी चाहिए, ध्यानालयों का निर्माण करना चाहिए.
ध्यानालय समाज में एकत्व स्थापित करने के लिए सहायक है और मंदिर समाज में उत्सव तथा सांस्कृतिक विविधता लाने में सहायक है. यह दोनों की विशेषता है.

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