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यहूदी मजहब का अन्य मजहबों पर असर

यहूदी मजहब और परंपरा निम्न प्रकार से है-

  1. यहूदी खतना करते है:- इस्राएल में पानी के कमी के कारण गुप्तांगो को एक विशिष्ट बीमारी होती थी, उसे बचने के लिए वे खतना करते है और यही उनका मजहबी रिवाज है.
  2. यहूदी सुअर से नफ़रत करते है तथा उसके मांस को वर्ज मानते है:- इस्त्रायल में पानी के कमी के कारण पानी का संरक्षण करना आवश्यक माना गया है. सुअर पानी को गंधा करते है, उसमे कीचड़ करते है. शायद इसी बजह से वे सूअर से नफ़रत करते होंगे.
  3. यह्दी  मूर्तिपूजा नहीं करते:- इसका कारण यह है की यहूदियों के १२ कबीले थे, वे सभी मूर्तिपूजक थे, उनके रितिरिवाज अलग-अलग थे. उनको लगा की इस अलग-अलग रीतिरिवाज के कारण ही यहूदियों में एकता नहीं है, वे संगठित नहीं है, उनमे लढने की क्षमता/जूनून  नहीं है. इसलिए उन्होंने मूर्तिपूजा का विरोध किया और एकेश्वरवाद की स्थापना की और सबका रीतिरिवाज एक किया.
  4. सिनेगाग (उपासना स्थल) – यहूदी रोज तिन बार प्रार्थना करते है. लोगों को सिनेगोग में बुलाने के लिए भोपू बजाते है. भोपू बजते ही सभी यहूदी सिनेगोग में एकत्रित आते है. वे दिन में तिन बार और त्यौहार के समय पांच बार प्रार्थना करते है.  इसके बावजूद वे सिनेगाग द्वारा स्कूल, अस्पताल, अन्य समाज सेवा का कार्य करते है.
  5. प्रोफेट/पैगम्बर- यहूदी प्रोफेट/पैगम्बर यह यहूदी परंपरा है. उनका प्रोफेट है मोजेस है. वे  मोजेस को वे मुख्य तथा आखरी पैगम्बर मानते है. मोजेस का अनुकरण करते है, उनके बताये मार्ग पर चलते है. लोग मोजेस का कहना माने इसलिए मोजेस ने खुद को यहोवा का संदेशवाहक/पैगम्बर बताया. यहोवा का दूत उसे मिलता है और सन्देश देता है ऐसा घोषित किया. मोजेस ने अपनेआप  को पहले के सभी दार्शनिकों जिनका प्रभाव लोगों पर था उनके साथ जोड़ा जैसे अब्राहम, जुडाह, नोह, इसाक इत्यादि. इन दार्शनिकों को भी पैगम्बर घोषित किया. पैगम्बरवाद का निर्माण ही मोजेस ने किया.(Reference – Hindu view of Christianity and Islam by Ram Swarup. Search this book in Google).
  6. एकेश्वरवाद- एकेश्वरवाद एक जूनून है जिसकी खोज मोजेस ने की. मोजेस के पहले भी कुछ इजिप्त के छोटे समूह एकेश्वरवाद को मानते थे. उनको देखकर ही मोजेस ने एक विशिष्ट व्यवस्था स्थापन की और यहूदी मजहब की स्थापना की. देवता का नाम “यहोवा” रखा. उस समय कई देवता को माना जाता था, उसमे से उन्होंने यहोवा को चुना. और इस देवता को ही एकमात्र घोषित किया. एकेश्वर घोषित किया.  मूलतः एकेश्वरवाद का उद्देश आध्यात्मिकता नहीं है तो समाज का संगठन है, जूनून है. इससे जो संगठनशक्ति बनती है उसका उद्देश देश से सभी गैरों को हकालना/मारना है. यह एक विचारधारा है, श्रद्धा के आधारपर बनाया संगठन है. इसके आधारपर मोजेस ने इस्राएल की स्थापना की और इस्राएल से सभी गैर-यहूदियों को भगा दिया. आगे चलकर इस एकेश्वरवाद का विभाजन हुआ. मसीहा को माननेवाले (मसीही-ख्रिस्तियन) और इश्मायल को मानने वाले इश्मायली अर्थात इस्लाम.  इन्होने भी मोजेस की किताब तौराह पर आधारित अपना-अपना अलग अलग एकेश्वरवाद/साम्राज्यवाद बनाया.  और अपने-अपने देश निर्माण किये और गैरों को वहाँ से भगाया/मार दिया. ये नए एकेश्वरवादी विस्तारवादी है. यहूदी केवल एक देश इस्राएल तक सिमित थे, किन्तु ये विस्तारवादी बने. यहूदियों ने इन एकेश्वरवादियों को आजतक मान्यता नहीं दी इसलिए वे यहूदियों से नफ़रत करते है. ये सभी एकेश्वरवादी परोक्ष रूप से यहूदियों का ही अनुकरण करते है और यहूदी किताब तौराह का ही आदर्श फैला रहे है.
  7. तौराह :- यह उनकी मजहबी किताब है. उनकी यह मान्यता है की यह किताब उनके देवता यहोवा ने मोजेस को दी है. इसका प्रत्येक शब्द उनके देवता यहोवा का है. इसके पहले किसी को भी यहोवा ने किताब नहीं दी, सिर्फ मोजेस को ही दी, इस तरह प्रचार किया गया.  इसी के आधर पर बाइबल और कुरान लिखी गयी.
  8. हलाका(halakah)- यह यहूदियों का एक मजहबी-कानून है.  इस कानून के प्रभाव में आकर चर्च का कानून बना, मुस्लिमों का शरिया बना.
  9. यहूदी उपवास भी करते है. योम कीपर के समय वे उपवास रखते है, वे फरिश्तों को मानते है, वे अपने देवता को खुश करने के लिए जानवरों की बलि भी देते है.

यह उनके रीतिरिवाज और मान्यता है, हिंदुओं को यहूदियों के रीतिरिवाज और मान्यता को मानने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकी हमारे पास अपने रितिरिवाज और परंपरा है. इसे मूर्तिपूजा के नाम पर नष्ट करना योग्य नहीं है. यह यहूदीकरण है.

कुछ मजहबों ने यहूदियों की देखा-देखी की और अपनेदेश की प्राचीन परम्पराओं को मूर्तिपूजा के नाम पर नष्ट किया, इसतरह न चाहते हुए भी वे यहूदीकरण का शिकार हुए और यहूदी मजहब तथा देवता यहोवा का कार्य कर रहे है. अधिक जानकारी के लिए पढ़े  http://www.simpletoremember.com/articles/a/islamjudaism/ तथा http://www.torahjudaism.org/index.php/articles उन्होंने यहूदी की किताब तौराह सचमुच ईश्वर की किताब समझ कर उस पर आधारित  एकेश्वरवाद बनाया. आज जितने भी एकेश्वरवादी है वे सभी आपस में झगड़ रहे है.

हिंदुओं के पास वेदों पर आधारित एकेश्वरवाद है. यह एकेश्वरवाद “एक सद विप्रा बहुधा वदन्ति” पर आधारित है. इसका अर्थ है ईश्वर एक है किन्तु ईश्वर को अनेक रूप तथा नाम से मानने का, पूजने का, उपासना करने का स्वातंत्र है. इससे ईश्वर के नाम से झगड़े नहीं होते, लोग आपस में सह-अस्तित्व की भावना रखते है, इससे समाज में शांति बनी रहती है. इसमें अपने और गैर ऐसे मानवता के टुकड़े नहीं है. यह एकेश्वरवाद मानवतावादी और सहिष्णु है, सह-अस्तित्व को प्रचलित करता है.  तौराह पर आधारित एकेश्वरवाद मानवता के दो टुकड़े करता है एक- अपने और गैर, फिर वह गैरों के खिलाफ लढाई करता है, उन्हें नष्ट करता है. इससे अशांति फैलती है. यहूदी-एकेश्वरवाद से प्रभावित मजहब हिंदुओं के धर्म को मूर्तिपूजा के नाम से नष्ट करना चाहते है. और इसी कारण भारत में अशांति का माहौल है.

हिंदुओं के सामने चुनौती है अपनी परंपराये बचाने की और संगठित होने की.

हिंदू/भारतीय अपनी संस्कृति, परंपरा, रीतिरिवाज को कायम रखकर उसके अनुसार ईश्वर-भक्ति और उपासना करें. साकार उपासना (मूर्तिपूजा) तथा निराकार उपासना (ध्यान-उपासना) में समन्वय प्रस्थापित करें.

यहूदी प्रभावित एकेश्वरवाद गैरों के खिलाफ एक जूनून है,  एक राजनैतिक, साम्राज्यवादी षडयंत्र है. हमें ऐसा जूनून या राजनैतिक षडयंत्र नहीं चाहिए, बल्कि सत्य-धर्मनिष्ठा और शांतिपूर्ण जीवन चाहिए.  जो भी राजनैतिक षड्यंत्र अपने देश के खिलाफ हो रहे है उसे देश के नेताओं ने कूटनीतिक तरीके से परास्त करना चाहिए अथवा समय-समय पर उचित सैन्य शक्ति का भी उपयोग करना चाहिए. इसके लिए हम सभी हिंदुओं ने अपनी संगठितशक्ति खड़ी करनी होगी.

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