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असुर परंपरा

इराक, सीरिया और अरबस्थान मिलकर जो भूभाग बनता है, उस भूभाग को प्राचीन काल में असुरिया कहा जाता था. क्योंकी वहां सदैव असुरी प्रवृति का जन्म होता है.
वहां पारसीयों की हुकूमत थी. तब वहा यहूदी, ईसाई या मुस्लिम मजहब नहीं थे.
पारसियों के देवता का नाम अहुर (अहुरमज्द) है.
इस देवता को संस्कृत में असुर कहा जाता है.
जब यहूदी मजहब स्थापित हुआ तो उन्होंने अहुर को यहुर, यहेवे या YHWE या यहोवा कहा.
यहोवा को ही मोजेस और जीसस का देवता कहा जाता है. और इसी देवता को कुरान ने अल्लाह कहा है. कई मुस्लिम आलिम कहते है की यहोवा और अल्लाह एक है.
यानी पारसियों का अहुर, यहूदी – ईसाईयों का यहोवा, मुस्लिमों का अल्लाह एक ही है. इसे संस्कृत में असुर कहां जाता है.
असुर परंपरा का देवता कहता है कि वह ही एकमात्र है, अन्य सभी देवता को नष्ट करो.
इसके अनुसार उसके अनुयायी सबको नष्ट करना चाहते है. ये असुर प्रवृति है.
पहले यह असुर प्रवृति पारसियों में थी, फिर यहूदियों में घुसी, फिर ईसाईयों में और मुस्लिमों में घुसी.
ISIS, तालिबान, जैश-ए-मोहमद ई. असुरी गिरोह इस असुरी प्रवृति के नमूने है.
ये असुरी प्रवृति हजारों सालों से भारत को त्रस्त कर रही है. आगे भी करेगी. हमें बिना डरे इस आसुरी प्रवृति का सतत मुकाबला करना चाहिए. सभी हिन्दू हौसला रखे- सत्यमेव जयते का. धर्म और अधर्म का संघर्ष तो निरंतर है और इसमें सदैव धर्म ही विजयी होता है.

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