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धर्म और अधर्म

पानी हमेशा निचे की ओर बहता है, उसे निचे जाने के लिए प्रयास की आवश्यकता नहीं होती. उसे उपर उठाने में प्रयास लगते है. अगर आपको पानी को किसी उचाई पर स्थित टंकी में डालना हो तो आपको मेहनत करनी पड़ती है.
पानी की तरह ही मनुष्य का स्वभाव होता है. वह नीचे की ओर अर्थात अधोगति की ओर आसानी से आकर्षित हो जाता है. उसे निचे अधोगति की ओर ले जाने के लिए प्रयास की आवश्यकता नहीं होती. किन्तु उसे उपर उठाने में उर्ध्वगति देने के लिए प्रयास की आवश्यकता होती है.
अधोगति अर्थात अधर्म.
उर्ध्वगति अर्थात धर्म
मनुष्य को अधर्म की ओर ले जाने के लिए प्रयास की आवश्यता नहीं होती. वह अपने आप आकर्षित होता रहता है.
मनुष्य को धर्म की ओर ले जाने के लिए प्रयास की आवश्यता होती है.
बुरी आदते रखना, नशा करना, अनैतिकता करना, अभद्र व्यवहार करना, हिंसा करना, भोगवादी प्रवृत्ति, यह अधर्म है.
तो सत्य का अनुसरण, प्रेम से रहना, अहिंसा, त्याग, शोर्य, नैतिकता, यह धर्म है.

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