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हिन्दुधर्म और संगठन

संगठन के लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है-
१. दैनंदिन एकत्रीकरण
२. विचारधारा

संगठित मजहबों में रोज एकत्रीकरण होता है। प्रार्थना के नाम पर उनका एकत्रीकरण होता है।

उनकी एक विचारधारा होती है। इस विचारधारा में अन्य लोगों के देव-देवताओं को नष्ट करना, उन्हे मारना, भगाना, लूटना, धर्मांतरित करना, इत्यादि विचार होते है।

हिन्दुधर्म यह संगठित नहीं है। हिंदुओं का रोज एकत्रीकरण नहीं होता और उनके पास कोई विचारधारा नहीं है।

भारत में आरएसएस इस संगठन में रोज एकत्रीकरण होता है. उनकी शाखा लगती है और उनके पास एक विशिष्ट विचारधारा है, जिसमें राष्ट्र-विरोधी, समाज विरोधियों का विरोध होता है।  आरएसएस में एकत्रीकरण और विचारधारा दोनों होने के कारण उसमे जानेवाले लोग संगठित होते है।

मात्र सभी हिंदू आरएसएस में नहीं जाते। इसलिए हिंदूधर्म में ही अगर संगठन अर्थात एकत्रीकरण की व्यवस्था हो तो सारे हिंदू संगठित होंगे. कुछ लोगों को विचारधारा से आपत्ति हो सकती है। इसलिए विचारधारा न हो तो भी केवल मात्र एकत्रीकरण से हिंदूधर्म संगठितधर्म होकर हिंदू संगठित होंगे।

यह एकत्रीकरण प्रार्थना/उपासना के आधार पर होता है. इसका समय निश्चित होता है अर्थात वह एक विशिष्ट समय पर होती है. इसका कालावधि कम होता है १० या १५ मिनिट ताकि लोग बार बार आ सके, उनका जादा समय नष्ट न हो.

यह सब पुण्य प्राप्ति के लिए, श्रद्धा के नाम पर होता है. संगठन के नाम पर नहीं. लोगों को मालुम ही नहीं होता की वे संगठित हो रहे है.

मंदिरों में भी रोज १० मिनिट की प्रार्थना/ध्यान-उपासना आयोजित की जा सकती है. मात्र ध्यानालय यह अच्छा पर्याय है. ध्यानालय एक हॉल होता है, वहा कई लोग एक साथ उपासना कर सकते है.

जो व्यक्ति हिंदुओं को संगठित करना चाहते है वे अपने क्षेत्र में ध्यानालय का निर्माण करें और लोगों को रोज सुबह-शाम ध्यान-उपासना के लिए एकत्रित करें. यह धर्म का कार्य है, ईश्वर का कार्य है यह भावना रखे.

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