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मुसलमानों का भ्रम

मुसलमानों का यह भ्रम है की उनका मजहब खुदा ने स्थापित किया. लेकिन हकीकत कुछ ओर है.

पुराने ज़माने में जब यहूदियों ने इस्रायल की स्थापना की, तब उन्होंने अपने एक कबीले को इस्रायल से बेदखल किया. वह कबीला था इश्मायली कबीला. यह कबीला अरबस्थान में स्थायिक हुआ.

इस्मायल का पिता अबराम एक पारसी था. अबराम को दो बेटे थे एक इसाक और दूसरा इश्मायल.

इश्मायल बड़ा बेटा था. लेकिन वह अबराम की लौंडी अर्थात गुलाम औरत से हुआ था. इसलिए यहूदियों ने उसे अबराम का वारिस मानने से इंकार किया और उन्होंने अबराम के छोटे बेटे इसाक जो अबराम की पत्नी सराई से हुआ था, उसे अबराम की विरासत सौपी.

इश्मायली काबिले के लोग का यहूदी मजहब को मानते थे. वे मोजेस को पैगम्बर मानते थे. मोजेस की कीताब तौराह को मानते थे. और जेरुसलेम की तरफ झुककर प्रार्थना करते थे. जेरुसलेम उनका किबला था. वे खतना करते थे. सूअर से नफ़रत करते थे. यहूदियों की तरह मूर्तिपूजा का विरोध करते थे.

जब वे अरबिया में स्थायिक हुए, तो उन्होंने अरबी भाषा और रीतिरिवाज अपनाये. मोजेस की कीताब को अरबी भाषा में रूपांतरित किया. अरबी लोगों को अपने कबीले में शामिल किया.

इसी इश्मायली कबीले को अरबी भाषा में इस्लाम कहा गया. उन्होंने अरबीयों की मूर्तिपूजा का विरोध किया. उनके खिलाफ जिहाद शुरू किया.

राष्ट्रवादी अरबियोने इस्लाम का पूरी तरह से अरबीकरण किया. और उसे अरबी मजहब घोषित किया. इसतरह इस्लाम यहूदी और अरबी परंपरा का मिश्रण है.

उन्होंने यहोवा का नाम बदलकर अरबी में अल-लाह रखा. अबराम का नाम बादल कर इब्राहीम किया. मोजेस को मूसा किया, जीसस को ईसा किया, गाब्रियल को जिब्रिल किया.

उन्होंने मोजेस की विचारधारा पर आधारित कुरान लिखी. अरबी पैगम्बर बनाया, हदीस लिखी. और मूल इस्मायलीयों को बेदखल किया, उन्हें शिया कहा जाने लगा.

उनकी कीताब कुरान यह मोजेस की विचारधारा है (कुरान ४६:१२). उसमे यहूदी और ईसाईयों का जिक्र है. उसमे जीसस को पैगम्बर माना है. उसमे यहूदी और ईसाई दोनों की बहुत चर्चा की है. सूरा २- बछड़ा, सूरा इमरान की फॅमिली, सूरा जोसेफ, सूरा मेरी में ईसाई मजहब के बारे में चर्चा की है. ref http://www.clearquran.com और बाकि जो छोटे छोटे सूरा है वह पर्शियन कविताये है.

वे यहूदियों के देवता यहोवा को अल-लाह कहते है. तो कुछ लोगों का मानना है की अल-लाह यह कुरैशी कबीले की देवता है.

उनका केंद्र मस्जिद है. मस्जिद मतलब माथा टेकने की जगह. वहां वे प्रार्थना के बहाने दिन में पांच बार इकट्ठे होते है. सप्ताह में एक बार शुक्रवार को भाषण देकर अरबी साम्राज्य बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जाता है. इसके लिए वे तकिया, दहशत और लालच का भी इस्तेमाल करते है. उनका एकही लक्ष है दुनिया में इस्लाम के बहाने अरबी हुकूमत कायम करना. इसके लिए वे ईसाईयों की तरह ही अनेक तरीकों का इस्तेमाल करते है.

अबराम ने जब हिब्रू लोगों को मजहब की तालीम दी तब उसका उद्देश था निराकार देवता की उपासना करना. मात्र यहूदियों ने इसका इस्तेमाल इस्रायल की स्थापना के लिए किया और अरबियों ने अरबी साम्राज्य को बढ़ाने के लिए किया. दोनोने मजहब के बारेमे भ्रम फैलाया.

ref.

http://www.religiontruths.wordpress.com

http://www.hindumuslimmatter.wordpress.com

http://www.simpletoremember.com

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