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ईसाईयों का तरीका अन्धविश्वास पर आधारित

ईसाई मजहब को वटिकन नाम का एक देश चलाता है. उसे संगठन कहना उचित होगा.
इस संगठन का एक मुखिया होता है जिसे पोप कहा जाता है. इस संगठन के हर देश में प्रतिनिधि है उन्हें कार्डिनल कहा जाता है. उनके निचे कई ऑफिसर/कमांडर होते है उन्हें बिशप, आर्च बिशप, पास्टर कहा जाता है, उन्हें भारत में पादरी कहा जाता है.
ये संगठन एक सरकार की तरह काम करता है. उनके केंद्र को चर्च कहा जाता है. चर्च एक प्रयेर हॉल है. जैसे लोग अपने अपने संगठन में कुछ प्रार्थना करते है, वैसे ही चर्च में प्रार्थना की जाती है. ये प्रार्थना उनके संगठन का एक हिस्सा है, टूल है.

उनका देवता यहोवा है, जो यहूदियों का देवता है. ये लोग यहूदियों से अलग हुआ एक गुट है. ये लोग मसीहा पर विश्वास रखते है कि वह एकदिन आयेगा और इस्राएल की स्थापना करेगा, इस्रायल में फिर से राजा डेविड का राज्य स्थापित करेगा. यहूदी इतिहास में राजा डेविड के राज्य को रामराज्य की तरह माना जाता है.

लेकिन उनका मसीहा यह कर नहीं सका. इसलिए वे ग्रीक में स्थानांतरित हुए. उन्होंने अपने गुट को ग्रीक भाषा में रूपांतरित किया. मसीहा को ख्रीस्त और मसीहा माननेवाले को ख्रिश्चन, इसतरह ईसाई मजहब बन गया.

बाद में ई.स. ३२५ में ग्रीक पार्लमेंट में के प्रस्ताव पास किया गया जिसमे ख्रीस्त को भगवान बनाया गया. इसमें केवल २२० कार्डिनल मौजूद थे. उनमे से २१८ ने अनुमति दी और २ लोगो ने इंकार किया. इंकार करनेवाले बाद में मारे गए. reference http://www.religionstruths.wordpress.com

जिसे वे देवता मानते है वह जीसस पहले एक यहूदी क्रांतिकारी था, फिरं उसे मसीहा बनाया गया, फिर भगवान बनाया गया. इसतरह अंधश्रद्धा बढ़ायी गयी.

ठीक है जिसकी जैसी श्रद्धा. सबको अपनी श्रद्धा रखने का अधिकार है. इसलिए उनके श्रद्धा से हमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

शुरुवात में तीसरी शताब्दी से लेकर ई.स. १५२९ तक वे क्रूसेड को मानते थे. क्रूसेड से ही अरबो ने जिहाद की आयडिया ली. क्रूसेड को ही वे जिहाद कहते थे. आज जिस तरह मुस्लिम जिहाद करते है, उसी तरह ईसाई भी जिहाद करते थे. लेकिन ई.स. १५२९ से उनमे तबदीली आयी. उन्होंने दहशत को छोडकर लालच/घुस देने के तरीके को अपनाया. पहले वे दहशत से अपनी संख्या बढ़ाते थे, अब वे घुस देकर अपनी संख्या बढ़ाते है.

एक उदाहरण देता हू:-
मेरा एक मित्र था. वह हमेशा एक ख्वाब रखता था की वह एक आमिर लड़की से प्यार करेगा, और अमिर बनेगा. वो जहा काम करता था वहां एक ईसाई लड़की काम करती थी, वह उससे प्यार करने लगा. उसके साथ चर्च में जाने लगा. उसने शादी करने का प्रस्ताव रखा, लड़की ने मान्य भी किया. पादरी की नजर उसपर पड़ी. पादरियों ने उसे बाप्तिसा करने की सलाह दी. वह ईसाई बन गया. उसे पादरियों ने एक फ्लैट दिया. इसतरह उसका सपना पूरा हुआ.
इस स्टोरी को एक नया मोड आ गया. छह महीने बाद पादरी ने फ्लैट वापस लिया. उनको लगा अब ये पक्का ईसाई बन गया. फिर मेरा मित्र उसकी पत्नी के साथ झोपड़पट्टी में रहने लगा. उसके सपने चूर चूर हुए. तब वह मेरे संपर्क में आया मैंने उसे सलाह दी फिर से हिन्दू होने की. वह फिर से हिन्दू बना और उसके पत्नी को भी हिन्दू बनाया.
जो लोग ईसाई बनते है, वे लालच के कारण बनते है. उन्हें लालच दिखाई जाती है, घुस दी जाती है.

चर्च में उपस्थिति लगानेवालों को बकायदा १५० रुपये महीना दिया जाता है. रकम भले ही छोटी हो लेकिन गरीब और लालची लोग इसमें फस जाते है.

जब आदमी लालच में पड जाता है तो उसकी बुद्धि काम नहीं करती. इसलिए लालच को बुरी बला कहा जाता है.
लालच और घुस देना ही उनका मतांतरण का तरीका है.

उनके लालच/घुस देने के तरीके इस प्रकार है:-
१. पैसा देना, जमीन/फ्लैट देना, घर को मरममत करने के लिए पैसे देना ई.
२. कलाकारों को पैसे देना, फिल्म बनाने के लिए पैसे दे कर उस फिल्म में अपने मजहब का प्रचार करवाना.
३. मगसेस/नोबेल जैसे पुरस्कार देना. और इनके जरिये भारत में विद्रोह की स्थिति पैदा करना.
४. मिडिया को आर्थिक सहायता देकर हिन्दुधर्म/बोद्धधर्म/जैनधर्म के खिलाफ दुष्प्रचार करना.
इत्यादि इत्यादि अनेक लालच और घुस देने के तरीके वे अपनाते है.

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