हिंदुओं में राजकीय दृष्टिकोण

हिंदुओं में राजकीय दृष्टिकोण

 

भारत तभी एकसंघ रह सकता है, सुरक्षित रह सकता है, जब हर राज्य तथा जिले में हिन्दू बहुसंख्या में हो. और वहां का हिन्दू संगठित हो. इसके लिए भारत सरकार की डोर हिन्दुहित का ध्यान रखनेवाले राजनेताओं के पास होनी चाहिए. भारत सरकार की नीतिया सदैव हिन्दुहित की होनी चाहिए. इसलिए हिन्दू हमेशा ऐसे नेताओं को तथा राजनैतिक पार्टियों को चुने जो हिन्दू हित को ध्यान में रखकर कार्य करते है. यह राजकीय दृष्टिकोण प्रत्येक हिंदुओं का होना चाहिए.

कहते है की औरंगजेब ने १५२ मंदिरों का पुनर्निमाण किया था. अकबर ने गौहत्या बंदी की थी. लेकिन उनकी जो नियत थी, दीर्घकालीन नीतिया थी, वह भारत में उनका मजहब फ़ैलाने की थी. अर्थात हिन्दुधर्म तथा अन्य धर्म को नष्ट करने की थी.

अगर ओवेसी जैसे लोग आपको कहेंगे कि वे आपको बिजली मुफ्त देंगे, खाना मुफ्त देंगे, पानी मुफ्त में देंगे तो क्या आप उसको चुन कर देंगे?  ये कहा से मुफ्त में देते है? इनके जेब से नहीं देते. पहले जनता के जेब से निकालते है. ऐसे नेताओं से सतर्क रहे.

आज भारत में जो नेता है, वे देशद्रोह को भी “बोलने की आजादी” मानते है. यह एक खतरनाक संकेत है. वोट बैंक के खातिर देश तथा हिंदुओं पर अन्याय करनेवाले नेताओं को साथ मत दो.

देश तथा हिंदुओं का हित राजनेता के हाथ में होता है, क्योंकि वे ही आपकी दिशा और दशा तय करते है. लेकिन केवल उनपर निर्भर रहना ठीक नहीं है, धर्मगुरु और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिन्दुहित के कार्य करने चाहिए. ये तीनों आपस में समन्वय स्थापित करके हिन्दुहित के लिए सदैव कार्य करें.

 

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